श्राद्ध में खीर क्यों खाया जाता है जानिए इसका वैज्ञानिक कारण और महत्व

खीर सभी को पसंद होती है और हिंदू धर्म में किसी भी शुभ काम में खीर जरूर बनाया जाता है। आम तौर पर पूरे भारत में चावल की खीर हीं ज्यादातर बनाई जाती है। यह बनाने में भी आसान होता है। खीर का प्रयोग शुभ कामों के अलावा श्राद्ध में भी किया जाता है। शुभ काम में खीर के महत्त्व के बारे में तो सभी जानते होंगे लेकिन श्राद्ध में खीर क्यों बनाया जाता है? इस बारे में बहुत काम लोग जानते होंगे। आज हम इस पोस्ट में इस बारे में यही चर्चा करेंगे।

जानिये “खीर” का वैज्ञानिक कारण और महत्व

शुभ काम में खीर

सनातन (हिन्दू) धर्म की हर प्राचीन परंपरा में वैज्ञानिकता का दर्शन होता है। हम सब जानते है की मच्छर काटने से मलेरिया होता है। वर्ष मे कम से कम 700-800 बार तो मच्छर काटते ही होंगे अर्थात 70 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते लाखों बार मच्छर काट लेते होंगे। लेकिन अधिकांश लोगो को जीवनभर में एक-दो बार ही मलेरिया होता है।कहने का मतलब यह है कि मच्छर के काटने से मलेरिया होता है, यह 1% ही सही है।

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खीर खाओ मलेरिया भगाओ :-

हमारे देश में ऐसे विज्ञापनो की कमी नहीं है, जो कहते हैं कि एक भी मच्छर ‘डेंजरस’ है, हिट लाओगे तो एक भी मच्छर नहीं बचेगा। अब ऐसे विज्ञापनो के बहकावे मे आकर करोड़ो लोग इस मच्छर बाजार मे अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो जाते है और इन कंपनियों के प्रोडक्ट्स खरीद कर धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं। इन मच्छर नाशक स्प्रे/कॉइल से मच्छरों को ज्यादा नुकसान नहीं होता है लेकिन इससे सबसे ज्यादा नुकसान आपके खुद के स्वास्थ्य पर होता है।

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मच्छर भगाने के इतने सारे प्रयासों के बाद भी मच्छर और रोगवाहक सूक्ष्म कीट नहीं काटेंगे यह हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन पित्त को नियंत्रित रखना तो हमारे हाथ में है। अब हमारी परम्पराओं का चमत्कार देखिये जिन्हे अल्पज्ञानी, दक़ियानूसी, और पिछड़ेपन की सोच कहके षड्यंत्र फैलाया जाता है।

हम सभी जानते है बैक्टीरिया बिना उपयुक्त वातावरण के नहीं पनप सकते। जैसे दूध मे दही डालने मात्र से दही नहीं बनता, दूध हल्का गरम होना चाहिए। उसे ढककर गरम वातावरण मे रखना होता है। बार बार हिलाने से भी दही नहीं जमता। ऐसे हीं मलेरिया के बैक्टीरिया को जब पित्त का वातावरण मिलता है, तभी वह 4 दिन में पूरे शरीर में फैलता है, नहीं तो थोड़े समय में समाप्त हो जाता है।

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वर्षा ऋतु के बाद जब शरद ऋतु आती है तो आसमान में बादल व धूल के न होने से कडक धूप पड़ती है। जिससे शरीर में पित्त कुपित होता है। इस समय गड्ढों आदि मे जमा पानी के कारण बहुत बड़ी मात्रा मे मच्छर पैदा होते है। इससे मलेरिया होने का खतरा सबसे अधिक होता है।

खीर खाने से पित्त का शमन होता है-

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शरद में ही पितृ पक्ष (श्राद्ध) आता है। पितरों का मुख्य भोजन है खीर। इस दौरान 5-7 बार खीर खाना हो जाता है। इसके बाद शरद पुर्णिमा को रातभर चाँदनी के नीचे चाँदी के पात्र में रखी खीर रखकर सुबह खाई जाती है (चाँदी का पात्र न हो तो चाँदी का चम्मच खीर मे डाल दे, लेकिन बर्तन मिट्टी, काँसा या पीतल का हो। क्योंकि स्टील जहर और एल्यूमिनियम, प्लास्टिक, चीनी मिट्टी महा-जहर है)





यह खीर विशेष ठंडक पहुंचाती है और पित्त को नियंत्रित करती है। जब तक पित्त आपके नियंत्रण में है तब तक मलेरिया जैसे रोग के बैक्टीरिया आपके शरीर में ज्यादा देर तक जिन्दा नहीं रह पाएंगे। खीर तो किसी भी दूध का बनाया जा सकता है लेकिन गाय के दूध की हो तो अतिउत्तम, विशेष गुणकारी (आयुर्वेद मे घी से अर्थात गौ घी और दूध गौ का) है। इससे मलेरिया होने की संभावना नहीं के बराबर हो जाती है ।

ध्यान रहे :- इस ऋतु में बनाई खीर में केसर और मेंवों का प्रयोग न करे । ये गर्म प्रवृत्ति के होने से पित्त बढ़ा सकते है। सिर्फ इलायची डाले। इसके अलावा मच्छरों से बचने के लिए सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग जरूर करें।



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