Jeevaputrika vrat Katha: जीमूतवाहन, चील और सियारिन की जिउतिया व्रत कथा

संतान की सुरक्षा, स्वास्थ्य, दीर्घायु, समृद्धि की मंगल कामना को पूर्ण करने वाला लोकपर्व है जीवित्पुत्रिका व्रत। आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जीवित्पुत्रिका का व्रत किया जाता है। इस साल यह व्रत 10 सितंबर गुरुवार को है। इस व्रत को महिलाएं अपनी संतान को कष्टों से बचाने और उनकी लंबी आयु की मनोकामना की पूर्ति के लिए करती हैं। इस व्रत को निर्जला किया जाता है।

कुछ जगहों पर इसे जितिया या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। हर व्रत की तरह इस व्रत की भी कई पौराणिक कथाएं हैं। आइए जानते हैं उन कथाओं के बारे में।

महाभारत की कथा (पहली कथा) –

Jitiya Vrat Katha Hindi
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एक कथा महाभारत के युद्ध से संबंधित है। जब महाभारत का युद्ध हुआ तो द्रोणाचार्य का वध करने के लिए पांडवों ने अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया ऐसी अफवाह फैला दी। चारों तरफ यह फैली इस खबर को सुनकर अश्वत्थामा के पिता द्रोणाचार्य ने शोक में अपने अस्त्र डाल दिए। तब द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया।

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इसके कारण प्रतिशोध के लिए अश्वत्थामा ने रात्रि के अंधेरे में पांडव समझकर उनके पांच पुत्रों की हत्या कर दी। इसके कारण पांडवों को अत्यधिक क्रोध आ गया, तब भगवान श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा से उसकी मणि छीन ली। जिसके बाद अश्वत्थामा पांडवों से क्रोधित हो गया और उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को भी जान से मारने के लिए उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।

भगवान श्री कृष्ण इस बात से भली-भांति परिचित थे कि ब्रह्मास्त्र को रोक पाना असंभव है। अत: भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल एकत्रित करके उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को दिया। इसके फलस्वरूप गर्भ में पल रहा शिशु पुनर्जीवित हो गया, जो बड़ा होकर राजा परीक्षित बना। उत्तरा के बच्चे के दोबारा जीवित हो जाने के कारण ही इस व्रत का नाम जीवित्पुत्रिका व्रत पड़ा। तब से ही संतान की लंबी उम्र और स्वास्थ्य की कामना के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत किया जाता है।

राजा जीमूतवाहन की कथा (दूसरी कथा) –

जीमूतवाहन
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एक दूसरी कथा राजा जीमुतवाहन की भी कही जाती है। गन्धर्वराज जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे। युवाकाल में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे। एक दिन भ्रमण करते हुए उन्हें नागमाता मिली, जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है।

नागवंश की रक्षा करने के लिए नागों ने गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा। इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है। नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट जाएंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता है और उन्होंने ऐसा ही किया।

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गरुड़ ने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ान भरी। लेकिन जब गरुड़ ने देखा कि हमेशा की तरह नाग चिल्लाने और रोने की जगह शांत है, तो उसने कपड़ा हटाकर जीमूतवाहन को पाया। जीमूतवाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बता दी, जिसके बाद उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागों को ना खाने का भी वचन दिया। तब से हर माता अपने पुत्र की रक्षा के लिए जिउतिया व्रत करने लगी।

यह व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि से आरंभ होकर नवमी तक होता है। व्रत का आरंभ सप्तमी तिथि को भोजन ग्रहण से शुरू किया जाता है, जिसे लोकभाषा में नहाय-खाय कहते हैं और अष्टमी के दिन पूरे दिन निर्जला उपवास रख कर नवमी तिथि को फिर उसी प्रकार सात्विक भोजन के साथ इसका पारण किया जाता है।

व्रत में माता पार्वती की आराधना की जाती है। साथ में उनके पुत्र गजानन की पूजा का भी विधान है। ऐसा माना जाता है कि जो माँएं सच्ची श्रद्धा के साथ माता पार्वती, गणेश जी और जीमुतवाहन की पूजा करती हैं, उनकी संतान को कभी कोई विघ्न बाधा नहीं आती और वह दीर्घायु और स्वस्थ रहती है। छठमहापर्व की तरह ही जीवित्पुत्रिका व्रत भी कठिन व्रतों में से एक है। ​इस व्रत में बिना पानी पिए कठिन नियमों का पालन करते हुए व्रत पूर्ण किया जाता है। चूँकि संतान की सुरक्षा माताओं के लिए पहली प्राथमिकता होती है, इसलिए वे ऐसा कठिन व्रत करती हैं।

चील और सियारिन की व्रत कथा (तीसरी कथा) –

जीमूतवाहन
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नर्मदा नदी के पास एक नगर था कंचनबटी। उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था। नर्मदा नदी के पश्चिम में बालुहटा नाम की मरुभूमि थी, जिसमें एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं।

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दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने भगवान श्री जीमूतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया। लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया।

सियारिन को अब भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया।

फिर अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया. शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। सिया‍रन, छोटी बहन के रूप में जन्‍मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई। अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीमूतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए। पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे।

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कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए। वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुरावती के मन में उन्‍हें देख इर्ष्या की भावना आ गयी। उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए। उन्‍हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया।

यह देख भगवान जीमूतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई। सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए। जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी। वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी।

जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई। अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था। भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं।

कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई. जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्‍होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया।

प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष के मध्य में आने वाले इस व्रत में अपने पुत्रों की लंबी आयु के लिए माताएं अपने पूर्वजों और जिमूतवाहन को सरसों तेल और खल्ली चढाती हैं। इस पर्व से जुड़ी कथा की चील और सियारिन की मिट्टी व गाय के गोबर से प्रतिमा बना कर उनकी पूजा की जाती है और उन्हे चुड़ा-दही चढाया जाता है। उसके बाद पूरे विधि-विधान से जिमूतवाहन की पूजा की जाती है और व्रत रखा जाता है।


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