जानिए क्यों जल में विसर्जित की जाती है देवी-देवताओं की मूर्तियाँ


नवरात्रि के दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है। इस दिन एक तरफ रावण का दहन किया जाता है वहीं दूसरी ओर मां दुर्गा भी वापस अपने लोक लौट जाती हैं। माता के जाने के बाद उनकी प्रतिमा को मूर्ति का भी नदी-तालाब में विसर्जन कर दिया जाता है क्योंकि शास्त्रों में ऐसा विधान बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार देवी-देवताओं की प्रतिमा को पूजन के बाद जल में समर्पित कर देना चाहिए। आइये जानते हैं शास्त्रों में ऐसा क्यों लिखा गया है।



मूर्ति को पानी में विसर्जित करने का कारण

शास्त्रों में कहा गया है कि देवी-देवताओं की मूर्ति को पूजन के बाद जल में समर्पित कर देना चाहिए। दरअसल जल के देवता वरुण हैं जो भगवान विष्णु के ही स्वरूप माने गए हैं। इसलिए जल को हर रूप में पवित्र माना गया है। यही कारण है कि कोई भी शुभ काम करने से पहले पवित्र होने के लिए जल का प्रयोग किया जाता है।

विसर्जित
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शास्त्रों के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में भी सिर्फ जल ही था और सृष्टि के अंत के समय भी सिर्फ जल ही शेष बचेगा। यानी जल ही अंतिम सत्य है। यहाँ तक कि भगवान राम ने भी धरती से विदा लेने के लिए जल समाधि का मार्ग चुना था। मूर्तियों को जल में विसर्जन के साथ जीवन के इस मूल मंत्र को भी जनमानस को समझाया जाता है कि जीवन अनमोल है, इसे व्यर्थ न गवाएं। मोह-माया और लालसा का त्यागकर उस परम सत्ता का स्मरण करते हुए जीवन निर्वाह करें और जीवन मृत्यु की निरंतरता को समझें।




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हम सभी ने टीवी सीरियल और फिल्मों में देखा है और धार्मिक ग्रंथों में पढा भी है कि भगवान विष्णु नीर यानी जल में निवास करते हैं इसलिए उन्हे नारायण भी कहा जाता है। जल में निवास होने के कारण जल को नरायण भी माना गया है। जल शांति, बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए जल में देव प्रतिमाओं का वसर्जित करने का विधान है।



जब भी हम किसी मूर्ति की स्थापना करते हैं तो मूर्ति पूजा से पहले उनकी प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। इस दौरान देवी-देवता अंश रूप में प्रतिमा में विराजमान हो जाते हैं। जब मूर्ति को जल में विसर्जित करते हैं तो वह जल मार्ग से अपने लोक को प्रस्थान कर जाते हैं।


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Source: NBT


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