शरद पूर्णिमा पर ऐसे करें माँ लक्ष्मी की पूजा, धन-धान्य की नही होगी कमी


अश्विन माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 17 कलाओं से परिपूर्ण होता है। जिसमें रात के समय खीर को खुले आसमान में रखना चाहिए और इसे सुबह प्रसाद के रुप में ग्रहण करना शुभ माना जाता है। इस बार यह पर्व 5 अक्टूबर, गुरुवार को है।

शरण पूर्णिमा
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ऐसी मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों में अमृत होता है। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर घूमने आती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। इस दिन राशि अनुसार उपाय करने से किस्मत चमकते देर नहीं लगती।

शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

शास्त्रों के अनुसार इसी दिन माता लक्ष्मी और महर्षि वाल्मीकि का जन्म हुआ था। भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय का जन्म भी इसी दिन हुआ था | शास्त्रों के अनुसार शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि के बाद मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर बैठकर धरती के मनोहर दृश्य का आनंद लेती हैं। इस दिन श्रीसूक्त, लक्ष्मीस्तोत्र का पाठ करके हवन करना चाहिए। इस विधि से कोजागर व्रत करने से माता लक्ष्मी अति प्रसन्न होती हैं तथा धन-धान्य, मान-प्रतिष्ठा आदि सभी सुख प्रदान करती हैं|

इस दिन आप अपने इष्ट देव की पूजा करें, तो आपको महान कृपा मिलेगी। इसके साथ ही महालक्ष्मी की भी पूजा करने का प्रावधान है। माना जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी अपने उल्लू में सवार होकर पृथ्वी का भ्रमण करती हैं। वह देखती है कि कौन रात में जगकर उनकी उपासना कर रहा है। जिसके बाद ही वह अपनी कृपा उन पर बरसाती हैं। इसलिए इस दिन रात में जगकर मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

शरद पूर्णिमा की रात को धन-संपत्ति के लिए चंद्रमा को अर्ध्य दे। उसके बाद भजन करें। जिससे कि आपके ऊपर भगवान चंद्रमा की कृपा बनी रहे।



क्या करें शरण पूर्णिमा पर

इस दिन गाय के दूध से खीर बनाकर उसमें घी और चीनी मिलाकर रात्रि में चन्द्रमा की रोशनी में रख दें। सुबह इस खीर का भगवान को भोग लगाएं तथा घर के सभी सदस्य सेवन करें। इस दिन खीर बनाकर चन्द्रमा की रोशनी में रखने से उसमें औषधीय गुण आ जाते हैं तथा वह मन, मस्तिष्क तथा शरीर के लिए अत्यन्त उपयोगी मानी जाती हैं। इससे दिमाग तेज होता है।


शरण पूर्णिमा
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आयुर्वेद के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन खीर को चन्द्रमा की किरणों में रखने से उसमे औषधीय गुण पैदा हो जाते है। और इससे कई असाध्य रोग दूर किये जा सकते है। खीर खाने का अपना औषधीय महत्त्व भी है। इस समय दिन में गर्मी होती है और रात को सर्दी होती है। ऋतु परिवर्तन के कारण पित्त प्रकोप हो सकता है। खीर खाने से पित्त शांत रहता है। इस प्रकार शारीरिक परेशानी से बचा जा सकता है।

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शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करना इस बात का प्रतीक है कि शीत ऋतु में हमें गर्म पदार्थों का सेवन करना चाहिए क्योंकि इसी से हमें जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होगी। ऐसी मान्यता है कि गाय के दूध में किसमिस और केसर डालकर चावल मिश्रित खीर बनाकर शाम को चंद्रोदय के समय बाहर खुले में रखने से उसमें पुष्टिकारक औषधीय गुणों का समावेश हो जाता है।


जब अगले दिन प्रातः काल उसका सेवन करते हैं, तो वह हमारे आरोग्य के दृष्टिकोण से अत्यंत लाभकारी हो जाती है। यह खीर यदि मिटटी की हंडिया में रखी जाये,और प्रातः बच्चे उसका सेवन करें ,तो छोटे बच्चों के मानसिक विकास में अतिशय योगदान करती है ऐसा आयुर्वेद में उल्लेखित है।

इस रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण करना पड़ता है और औषंधि सेवन के पश्चात 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है।

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