श्री रामायण जी की आरती हिन्दी में, डाउनलोड आरती MP3 & Video

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भगवान श्री राम की पूजा हर घर में होती है। उन्हें मर्यादा पुरुषोतम भी कहा जाता है। ऐसे में कई प्रसिद्द कवियों ने श्री रामचंद्र जी की आरती को अपने-अपने तरीके से गाया है। उन सभी आरतियों को हमने यहां संकलित किया है। आप इन आरतियों को MP3 में भी डाउनलोड कर सकते हैं। इसके लिए आपको दिए गए लिंक पर क्लिक करना होगा। इसके अलावा आप यूट्यूब वीडियो में भी ये आरती देख सकते हैं।

श्री रामायण जी की आरती

श्री रामायण जी की आरती

आरती श्री रामायण जी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥

गावत ब्रहमादिक मुनि नारद। बाल्मीकि बिग्यान बिसारद॥
शुक सनकादिक शेष अरु शारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥ आरती श्री रामायण जी की ॥

गावत बेद पुरान अष्टदस। छओं शास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥
मुनि जन धन संतान को सरबस। सार अंश सम्मत सब ही की॥ आरती श्री रामायण जी की ॥

गावत संतत शंभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुशुंडि गरुड़ के ही की॥ आरती श्री रामायण जी की ॥

कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ॥
दलनि रोग भव मूरि अमी की। तात मातु सब बिधि तुलसी की॥ आरती श्री रामायण जी की ॥

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श्री रामचंद्र जी की आरती

आरती कीजै रामचन्द्र जी की।
हरि-हरि दुष्टदलन सीतापति जी की॥

पहली आरती पुष्पन की माला।
काली नाग नाथ लाये गोपाला॥


दूसरी आरती देवकी नन्दन।
भक्त उबारन कंस निकन्दन॥

तीसरी आरती त्रिभुवन मोहे।
रत्‍‌न सिंहासन सीता रामजी सोहे॥

चौथी आरती चहुं युग पूजा।
देव निरंजन स्वामी और न दूजा॥

पांचवीं आरती राम को भावे।
रामजी का यश नामदेव जी गावें॥


तुलसीदास रचित श्री रामचंद्र जी की आरती

॥दोहा॥
श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नोमि जनक सुतावरं॥२॥

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं॥३॥


शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं॥४॥

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं।
मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं॥५॥

मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो।
करुणा निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो॥६॥

एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषित अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली॥७॥

॥सोरठा॥
जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम अङ्ग फरकन लगे।

रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास

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