फर्जी प्रमाण-पत्र पर सरकारी सेवा का लाभ उठाने वाले लोग इस न्यूज़ को जरूर पढ़ें

कोई भी सरकारी काम करवाने में अकसर लोगों को लम्बा समय लग जाता है। और जब बात किसी भी तरह की कोई भी प्रमाण-पत्र बनवाने की हो तो इसमें इतने सारे प्रोसेस होते हैं और इतने जगह सिग्नेचर और मुहर करवाने होते हैं कि थक-हारकर लोग बिना इसे बनवाए ही बैठ जाते हैं और जब उसके इस्तेमाल का समय आता है तो जालसाजी करके किसी भी तरह से नकली प्रमाण-पत्र बनवा लेते हैं और अपना काम चला लेते हैं।

फर्जी प्रमाण-पत्र के मामले में बॉम्बे कोर्ट ने क्या कहा?

एक मामले में बहुत सारे ऐसे सरकारी कर्मचारी ऐसे पाए गए जिन्होंने अपने समय में फर्जी जाति प्रमाण-पत्र का इस्तेमाल करके आरक्षण में डिग्री और नौकरी पाया था। लेकिन इस बात को उजागर होने के बाद ऐसे लोगों को नौकरी से हटाने का निर्णय लिया गया था। लेकिन इसी बीच बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला आया था कि यदि कोई व्यक्ति लम्बे समय से सरकारी नौकरी कर रहा है और यदि इस बीच उसका प्रमाण-पत्र नकली पाया जाता है तो उसे राहत देते हुए उनके पद पर बने रहने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, वैसे लोग जिन्होंने हाल ही में नौकरी पाया हो और जांच में उनका प्रमाण-पत्र फर्जी पाया जाता है तो उनकी नौकरी छीनी जा सकती है।

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फर्जी प्रमाण-पत्र के इस मामले में हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?

लेकिन हाल ही में गुरूवार को दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर और न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूर की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले को रद्द कर दिया है और कहा है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर आरक्षण लेकर ली गई दाखिले या सरकारी नौकरी को क़ानून की नजर में वैध नहीं ठहराया जा सकता है। महाराष्ट्र के ऐसे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चाहे किसी भी सरकारी ने कर्मी भले ही 20 साल तक या कितने भी समय तक अपनी सेवा क्यों न दी हो, यदि किसी का जाति प्रमाण पत्र नकली पाया जाता है तो उसकी सरकारी नौकरी छीन ली जाएगी और अवैध प्रमाण-पत्र वाली शिक्षा और डिग्री भी रद्द कर दी जाएगी।

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हालांकि, फिलहाल ये मामला आरक्षण के अंतर्गत फर्जी प्रमाण-पत्र देकर नौकरी और डिग्री पाने वाले लोगों के लिए ही है लेकिन हाईकोर्ट के इस कदम से ये तो तय है कि भविष्य में यदि किसी भी तरह के फर्जी प्रमाण-पत्र पर कोई भी सरकारी सेवा लोगों को मिल रही होगी तो उस मामले के उजागर होने पर सुप्रीम कोर्ट ऐसे लोगों को मिलने वाली उस सेवा को भी रद्द कर सकती है।

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