जगन्नाथ पुरी में रथ यात्रा शुरू, जानें रथ यात्रा से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में आज से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा शुरू हो गई है। यह रथयात्रा भारत हीं नही बल्कि विदेशों में भी बहुत मशहूर है। पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु इस रथ यात्रा को देखने आते हैं। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा हर साल आषाढ मास के शुक्ल पक्ष में द्वितीया के दिन शुरू होती है।


इस दिन भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने जन्मस्थान श्रीगुंडिचा मंदिर जाते हैं इसलिए इस महोत्सव को गुंडिचा महोत्सव भी कहा जाता है। यह मंदिर, श्री जगन्नाथ मंदिर लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर है। इस दिन भगवान जगन्नाथ को उनके बड़े भाई और बहन के साथ रथ पर बैठाकर वहाँ ले जाया जाता है। इस महोत्सव में आए हजारों लोग इस रथ को खींचते हैं। जिसे भी ये रथ खींचने का अवसर मिलता है वो अपने आपको सौभाग्यशाली समझता है।

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क्यूँ अधूरी है मूर्ति?

Jagannath Puri rath yatra starts today
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रथयात्रा के समय भगवान जगन्नाथ, भैया बलभद्र और बहन सुभद्रा की अधूरी मूर्ति को रथ में रखा जाता है। इसे देखकर बहुत लोगों के मन में ये सवाल उठता है कि आखिर इनकी मूर्ति अधूरी क्यूँ है। इसके पीछे एक पौराणिक कहानी है।

शास्त्रों के अनुसार जब देव शिल्पी विश्वकर्मा, भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बना रहे थे तब उन्होने राजा के सामने शर्त रखी कि वह दरवाज़ा बंद करके मूर्ति बनाएंगे और जब तक मूर्ति नहीं बन जाती, राजा या किसी को भी दरवाज़ा नहीं खोलना होगा। मूर्ति पूरी होने से पहले अगर राजा या किसी ने भी दरवाज़ा खोला तो वह मूर्ति बनाना छोड़ देंगे।

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मूर्ति निर्माण का काम चल रहा है या नही ये जानने के लिए राजा रोज़ दरवाजे के बाहर खड़े होकर मूर्ति बनने की आवाज़ सुनते थे। एक दिन राजा को आवाज़ सुनाई नहीं दी। ऐसे में राजा को लगा कि विश्वकर्मा काम छोड़कर चले गए हैं और तब राजा ने दरवाजे खोल दिए। दरवाजा खुला देखकर विश्वकर्मा अपने शर्त के अनुसार वहां से ग़ायब हो गए और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्ति अधूरी रह गई। तब से हम सब भगवान को इस रूप में देखते आ रहे हैं।

कैसे होती है रथ यात्रा की तैयारी

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भगवान जगन्नाथ की यात्रा की तैयारी 5 महीने पहले से हीं शुरू हो जाती है। भगवान जगन्नाथ का जो रथ बनाया जाता है वो 13.5 मीटर ऊंचा होता है और उसमे 16 पहिये होते हैं। इस रथ को गरूड़ध्वज या कपिलध्वज कहा जाता है। वहीं भैया बलराम का रथ 13.2 मीटर ऊंचा होता है और उसमे 14 पहिये होते हैं। इस रथ को ‘तलध्वज’ कहते हैं। बहन सुभद्रा का रथ ‘पद्मध्वज’ कहलाता है। यह रथ 12.9 मीटर ऊंचा होता है और इसमे 12 पहिए लगे होते हैं। इस रथ में लाल, काले कप़ड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का प्रयोग होता है।

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ऐसा कहा जाता है कि रथयात्रा के दिन प्रभु जगन्नाथ खुद दारुब्रह्म बन जाते हैं और अपने भक्तों से मिलने के लिए और उनको मुक्ति देने के लिए अपने मंदिर से निकलकर दारु यानी रथ में प्रवेश करते हैं। इस दिन पुरी के महाराज सोने के झाड़ू से रथ के साथ-साथ उस रास्ते पर झाड़ू लगाते हैं जिस रास्ते से भगवान जगन्नाथ का रथ निकलने वाला होता है और फिर महाराज अपनी जनता को प्रणाम करते हैं।

बाहुड़ा यात्रा

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भगवान जगन्नाथ श्रीगुंडिचा मंदिर में नौ दिनों तक रहते हैं और उसके बाद भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर लौट आते हैं। इसे बाहुड़ा यात्रा कहा जाता है। इस यात्रा के दिन भी लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए जगन्नाथ पुरी पहुँचते हैं। बाहुड़ा यात्रा के दिन भगवान श्री मंदिर में प्रवेश न कर के रथ में ही रहते हैं और अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। फिर अगले दिन पूजा-पाठ के साथ उनका मंदिर में प्रवेश होता है। तिथि की गणना के अनुसार इस बार बाहुड़ा यात्रा 3 जुलाई को पड़ रही है।


हालांकि जगन्नाथ मंदिर में सिर्फ हिन्दुओं को ही अंदर जाने की अनुमति है, लेकिन इस दिन हर जाति और दुसरे देशों से आये हुए लोगों को भी प्रभु के दर्शन का मौका मिलता है। विश्व भर से पूरी रथ यात्रा पर आये हुए भक्त और श्रद्धालुओं की बस एक ही कामना होती है कि किसी भी तरह से उन्हें एक बार प्रभु के रथ को रस्सी से खींचने का मौका मिले।

सच्ची खबर की टीम की तरफ से आप सभी को रथयात्रा की हार्दिक शुभकामनाएँ।



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