राष्ट्रपति चुनाव: जानिए कैसे चुने जाते हैं भारत के प्रथम नागरिक

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियां जोरों पर है। अखबार, टीवी न्यूज और यहाँ तक कि जब चार लोग एक जगह बैठ रहे हैं तो उनके बीच भी यही चर्चा हो रही है कि कौन बनेगा राष्ट्रपति? बता दें कि भारत के 14वें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए तारीख का ऐलान हो चुका है। 17 जुलाई को देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद के लिए चुनाव होगा वहीं 20 जुलाई को वोटों की गिनती की जाएगी।

वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 24 जुलाई 2017 को खत्म होने वाला है। देश में सत्तारूढ दल एनडीए ने अपने राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में रामनाथ कोविंद को मैदान में उतारा है वहीं विपक्षी दलों ने मिल कर मीरा कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया है। राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रक्रिया साधारण चुनाव प्रक्रिया से बिल्कुल हीं अलग है। आइये जानते हैं कि राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है।

राष्ट्रपति चुनाव
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कैसे होता है राष्ट्रपति का चुनाव

राष्ट्रपति चुनाव से पहले एक खास प्रक्रिया अपनाई जाती है जिसे इलेक्टोरल कॉलेज कहते हैं। इस प्रक्रिया के तहत जनता को राष्ट्रपति चुनने का अधिकार नही होता है बल्कि के जनता के द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधि राष्ट्रपति चुनाव में वोट करते हैं। इसे अप्रत्यक्ष निर्वाचन भी कहते हैं।

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किसे होता है वोट का अधिकार

राष्ट्रपति चुनाव में सभी राज्यों के विधानसभा के विधायक और लोकसभा सांसद वोट डालते हैं। जबकि राष्ट्रपति द्वारा संसद में नामित सदस्य और राज्यों की विधान परिषद के सदस्य को वोट डालने का अधिकार नही होता है क्यूँकि ये जनता द्वारा चुने हुए नही होते हैं।

रामनाथ कोविंद
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राष्ट्रपति चुनाव में एक खास तरीके से वोटिंग होती है, जिसे ‘सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम’ कहते हैं। आम चुनाव में वोटर को एक हीं वोट देने का अधिकार होता है, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में शामिल सभी उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकता तय करने की छूट होती है। इस चुनाव में वोट देने वाले को बैलेट पेपर पर अपनी पसंद को पहले, दूसरे तथा तीसरे क्रमानुसार बताना होता है। अब अगर पहली पसंद वाले उम्मीदवार को मिले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर कर दिया जाता है।

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अनुपातिक व्यवस्था

राष्ट्रपति चुनाव में वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के वोट का वेटेज अलग-अलग होता है। दो राज्यों के विधायकों के वोटों का वेटेज भी अलग-अलग होता हैं। यह वेटेज जिस तरह से तय होता है, उसे अनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कहा जाता हैं।

विधायक के वोट

राष्ट्रपति चुनाव
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किसी भी विधायक के वोट का वेटेज जानने के लिए उस राज्य की जनसंख्या और विधानसभा सदस्यों की संख्या को देखा जाता है। वेटेज निकालने के लिए प्रदेश की जनसंख्या को चुने गए विधायकों की संख्या से भाग दिया जाता है. इस तरह जो अंक मिलता है, उसे फिर 1000 से भाग दिया जाता है। अब जो अंक आता है, वही उस राज्य के एक विधायक के वोट का वेटेज होता है। 1000 से भाग देने पर अगर शेष 500 से ज्यादा हो तो वेटेज में 1 जोड़ दिया जाता है।

सांसद के वोट

सबसे पहले सभी रा्ज्यों की विधानसभाओं के चुन गए सदस्यों के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है.इसके बाद सामूहिक वेटेज का राज्यसभा और लोकसभा से चुने गए सदस्य की कुल संख्या से भाग दिया जाता है। इसके बाद जो नंबर सामने आता है वहीं एक सांसद के वोट का वेटेज होता है। ऐसे में अगर भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा बचता है तो वेटेज में एक और जोड़ दिया जाता है।

राष्ट्रपति चुनाव की खास बात ये है कि इसमें सबसे ज्यादा वोट हासिल करने से ही जीत तय नहीं होती है बल्कि राष्ट्रपति वहीं बनता है, जो सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधे से अधिक अंक हासिल करता है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो इस चुनाव में पहले से तय होता है कि जीतने वाले को कितने वोट या वेटेज पाना होगा।

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कैसे होती है वोटों की गिनती

राष्ट्रपति चुनाव के लिए जो इलेक्टोरल कॉलेज बनाया गया है, वर्तमान में उसके सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है यानि जीत के लिए राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को 5,49,442 वोट हासिल करने होंगे। इस सबसे पहले का मतलब समझने के लिए वोट काउंटिंग में प्राथमिकता पर गौर करना होगा। सांसद या विधायक वोट देते वक्त अपने मतपत्र पर बता देते हैं कि उनकी पहली पसंद वाला कैंडिडेट कौन है, दूसरी पसंद वाला कौन और तीसरी पसंद वाला कौन आदि आदि। सबसे पहले सभी मतपत्रों पर दर्ज पहली वरीयता के मत गिने जाते हैं। यदि इस पहली गिनती में ही कोई कैंडिडेट जीत के लिए जरूरी वेटेज का कोटा हासिल कर ले, तो उसकी जीत हो गई। लेकिन अगर ऐसा न हो सका, तो फिर एक और कदम उठाया जाता है।

Ramnath Kovind
Ramnath Kovind (Image Source :- Google)

कैसे होते हैं उम्मीदवार बाहर

पहले उस कैंडिडेट को रेस से बाहर किया जाता है, जिसे पहली गिनती में सबसे कम वोट मिले। लेकिन उसको मिले वोटों में से यह देखा जाता है कि उनकी दूसरी पसंद के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं। फिर सिर्फ दूसरी पसंद के ये वोट बचे हुए उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर किए जाते हैं। यदि ये वोट मिल जाने से किसी उम्मीदवार के कुल वोट तय संख्या तक पहुंच गए तो वह उम्मीदवार विजयी माना जाता है, अन्यथा दूसरे दौर में सबसे कम वोट पाने वाला रेस से बाहर हो जाएगा और यह प्रक्रिया फिर से दोहराई जाएगी। इस तरह वोटर का सिंगल वोट ही ट्रांसफर होता है। अगर अंत तक किसी को तय कोटा न मिले तो भी इस सिलसिले में उम्मीदवार बारी-बारी से बाहर होते रहते हैं और आखिर में जिसे भी सबसे अधिक वोट मिलते हैं वही विजयी होता हैं।

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